“कौन हूँ मैं ?"
कौन हूँ मैं?
ये सवाल अचानक मेरे दरवाज़े पर आया,
कभी सोचा ही नहीं था,
कि खुद से भी एक दिन यूँ सामना होगा।
कभी बेटी हूँ,
कभी बहन बन जाती हूँ,
कभी किसी की दोस्त,
तो कभी माँ सा दिल रख जाती हूँ।
जो मुझे समझ नहीं पाते,
उनकी नज़रों में शायद मैं दुश्मन भी हूँ,
पर क्या बस इतना ही हूँ मैं?
या इसके आगे भी कुछ हूँ?
दिल से साफ हूँ,
गलतियों के बावजूद माफ करना जानती हूँ,
अपने दर्द को छुपाकर,
दूसरों के चेहरे पर मुस्कान लाना जानती हूँ।
कभी बहुत मजबूत लगती हूँ,
तो कभी अंदर से बिखर जाती हूँ,
कभी सब कुछ आसान लगता है,
तो कभी हर चीज़ भारी हो जाती है।
जिसे कभी प्यार की तलाश थी,
आज वो बस सुकून ढूंढती है,
भगवान का साथ चाहती है,
थोड़ी सी शांति मांगती है।
मैं एक इंसान हूँ—कमियों से भरी,
किसी के लिए अच्छी,
तो किसी के लिए बुरी,
पर जो भी हूँ, सच्ची हूँ।
हर एक एहसास के पीछे,
एक छोटी सी लड़की छुपी है,
जिसके दिल में अभी भी मासूमियत है,
और आँखों में बहुत बड़े-बड़े ख्वाब हैं।
वो हर बार टूटकर भी सपने देखती है,
हर बार डरकर भी आगे बढ़ती है,
दुनिया उसे समझे या ना समझे,
पर वो खुद को खोना नहीं चाहती है।
शायद वही छोटी सी लड़की,
आज भी मुझे जीना सिखाती है,
हर दर्द के बाद भी,
फिर से मुस्कुराना याद दिलाती है।
अब बस इतना चाहती हूँ,
कि हर हाल में मुस्कुराती रहूँ,
और इस सवाल के साथ भी,
थोड़ा और खुद को समझती रहूँ।
कौन हूँ मैं?
शायद अभी भी जवाब अधूरा है…
पर शायद यही सफर,
मुझे एक दिन पूरा करेगा।
-by khudse
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